दाल बाटी चूरमा राजस्थान की शान और पहचान है। यह सिर्फ एक व्यंजन नहीं, बल्कि राजस्थानी संस्कृति, परंपरा और मेहमाननवाज़ी का प्रतीक है। जब भी किसी घर में खास मेहमान आते हैं या कोई बड़ा त्योहार होता है, तो दाल बाटी चूरमा ज़रूर बनाया जाता है। देसी घी की खुशबू, पंचमेल दाल का स्वाद और मीठे चूरमे की मिठास – यह संयोजन हर किसी का दिल जीत लेता है।
आज यह व्यंजन सिर्फ राजस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे भारत में और विदेशों में भी खूब पसंद किया जाता है। लेकिन इसका असली स्वाद आज भी राजस्थान की मिट्टी में ही मिलता है।
सबसे ज्यादा कहां बनाया जाता है?
दाल बाटी चूरमा सबसे ज्यादा राजस्थान राज्य में बनाया और खाया जाता है। खासकर मारवाड़, मेवाड़, बीकानेर, जोधपुर, जयपुर और आसपास के क्षेत्रों में यह दैनिक भोजन से लेकर त्योहारों तक हर मौके पर बनाया जाता है।
ग्रामीण इलाकों में तो यह पारंपरिक चूल्हे पर बनाई जाती है, जिससे इसका स्वाद और भी बढ़ जाता है। शादी-ब्याह, तीज-त्योहार, धार्मिक कार्यक्रम और विशेष अवसरों पर यह व्यंजन लगभग अनिवार्य होता है।
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यह किस राज्य का फेवरेट है?
यह राजस्थान का सबसे फेवरेट और पारंपरिक व्यंजन माना जाता है। जैसे पंजाब का सरसों का साग और मक्के की रोटी प्रसिद्ध है, वैसे ही राजस्थान का दाल बाटी चूरमा विश्व प्रसिद्ध है।
राजस्थान की कठोर जलवायु और शुष्क क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए यह पौष्टिक और ऊर्जा देने वाला भोजन रहा है।

कब से लोग इसे खा रहे हैं?
ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार, दाल बाटी चूरमा सैकड़ों सालों से राजस्थान में खाया जा रहा है। कहा जाता है कि पुराने समय में राजपूत योद्धा युद्ध के दौरान बाटी को रेत में दबाकर पका लेते थे। यह लंबे समय तक खराब नहीं होती थी और ऊर्जा भी देती थी।
धीरे-धीरे इसमें दाल और चूरमा का समावेश हुआ और यह पूर्ण भोजन बन गया। तब से लेकर आज तक यह परंपरा जारी है।
दाल बाटी चूरमा खाने के लाभ
ऊर्जा से भरपूर – बाटी गेहूं के आटे से बनती है और देसी घी में डूबी होती है, जिससे शरीर को भरपूर ऊर्जा मिलती है।
प्रोटीन का अच्छा स्रोत – पंचमेल दाल में कई प्रकार की दालें होती हैं, जो प्रोटीन और फाइबर से भरपूर होती हैं।
पाचन में सहायक – दाल में मौजूद फाइबर पाचन तंत्र को मजबूत करता है।
शारीरिक श्रम करने वालों के लिए उत्तम – यह भोजन भारी काम करने वाले लोगों के लिए ताकत देता है।
संतुलित भोजन – इसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा का अच्छा संतुलन होता है।
दाल बाटी चूरमा खाने के नुकसान
ज्यादा घी – इसमें अधिक मात्रा में घी होता है, जिससे कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है।
भारी भोजन – यह पचने में थोड़ा भारी होता है, खासकर कम शारीरिक गतिविधि करने वालों के लिए।
वजन बढ़ने की संभावना – अधिक मात्रा में खाने से वजन बढ़ सकता है।
डायबिटीज रोगियों के लिए सावधानी – चूरमा में चीनी अधिक होती है, इसलिए सीमित मात्रा में खाएं।
दाल बाटी चूरमा बनाने की सामग्री
बाटी के लिए
गेहूं का आटा – 3 कप
सूजी – 1/2 कप
नमक – स्वादानुसार
अजवाइन – 1 छोटा चम्मच
बेकिंग सोडा – चुटकी भर
देसी घी – 1/2 कप
पानी – गूंधने के लिए
दाल के लिए
मूंग दाल
तूर दाल
चना दाल
मसूर दाल
उड़द दाल (थोड़ी मात्रा में)
हल्दी
नमक
लाल मिर्च
जीरा
हींग
लहसुन
प्याज
हरा धनिया
घी
चूरमा के लिए
बाटी (सिकी हुई)
देसी घी
पिसी हुई चीनी या गुड़
इलायची पाउडर
मेवे (काजू, बादाम)
Tata Sampann Unpolished Toor Dal/Arhar Dal, 1kg
बनाने की विधि
1. बाटी बनाना
सबसे पहले आटे में सूजी, नमक, अजवाइन और घी मिलाएं। इसे अच्छी तरह मिलाकर पानी की सहायता से सख्त आटा गूंथ लें।
आटे की गोल-गोल लोइयां बनाएं।
इन्हें ओवन या तंदूर में 180-200 डिग्री पर सुनहरा होने तक सेकें। पारंपरिक तरीके से इन्हें उपलों या चूल्हे की आंच में भी पकाया जाता है।
सिकने के बाद गरम बाटियों को घी में डुबो दें।
2. दाल बनाना
सभी दालों को धोकर कुकर में हल्दी और नमक डालकर उबाल लें।
कढ़ाई में घी गर्म करें। उसमें जीरा, हींग, लहसुन और प्याज डालकर भूनें।
अब मसाले डालें और उबली हुई दाल मिलाएं।
धीमी आंच पर 10-15 मिनट पकाएं। ऊपर से हरा धनिया डालें।
3. चूरमा बनाना
सिकी हुई बाटी को तोड़कर मिक्सर में मोटा पीस लें।
इसमें घी, चीनी या गुड़, इलायची और मेवे मिलाएं।
अच्छी तरह मिलाकर परोसें।
दाल बाटी चूरमा कब खाना चाहिए?
दोपहर के भोजन में इसे खाना सबसे अच्छा माना जाता है, क्योंकि इसे पचाने के लिए समय मिलता है।
त्योहारों, खास मौकों या पारिवारिक समारोह में।
जब शरीर को अधिक ऊर्जा की जरूरत हो।
रात में इसे कम मात्रा में खाना बेहतर होता है, क्योंकि यह भारी भोजन है।
सेहत के लिए कैसा होता है?
यदि संतुलित मात्रा में खाया जाए तो यह सेहत के लिए अच्छा है। इसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और स्वस्थ वसा मौजूद होती है।
लेकिन यदि आप कम शारीरिक गतिविधि करते हैं या वजन कम करना चाहते हैं, तो इसे सीमित मात्रा में ही खाएं। घी की मात्रा कम करके इसे थोड़ा हेल्दी बनाया जा सकता है।
ज्यादा खाने से क्या होता है?
पेट भारी हो सकता है।
अपच या गैस की समस्या हो सकती है।
वजन बढ़ सकता है।
सुस्ती महसूस हो सकती है।
इसलिए हमेशा संतुलित मात्रा में ही सेवन करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: क्या दाल बाटी चूरमा रोज खाया जा सकता है?
उत्तर: नहीं, यह भारी भोजन है। सप्ताह में एक बार या विशेष अवसर पर खाना बेहतर है।
प्रश्न 2: क्या इसे बिना घी के बनाया जा सकता है?
उत्तर: हां, कम घी में भी बनाया जा सकता है, लेकिन असली स्वाद घी से ही आता है।
प्रश्न 3: क्या यह बच्चों के लिए अच्छा है?
उत्तर: हां, लेकिन कम मात्रा में और कम घी के साथ दें।
प्रश्न 4: क्या डायबिटीज रोगी इसे खा सकते हैं?
उत्तर: चूरमा में चीनी कम रखें या गुड़ का उपयोग करें और सीमित मात्रा में खाएं।
प्रश्न 5: क्या इसे ओवन के बिना बनाया जा सकता है?
उत्तर: हां, इसे तंदूर, गैस तवा या चूल्हे पर भी बनाया जा सकता है।
निष्कर्ष
दाल बाटी चूरमा सिर्फ एक भोजन नहीं, बल्कि राजस्थान की आत्मा है। यह परंपरा, स्वाद और ऊर्जा का अद्भुत संगम है। सदियों से लोग इसे खाते आ रहे हैं और आज भी इसकी लोकप्रियता कम नहीं हुई है।
अगर सही मात्रा में और सही समय पर खाया जाए, तो यह शरीर को ऊर्जा और संतुलित पोषण देता है। लेकिन अत्यधिक सेवन से बचना चाहिए।
एक बार घर पर असली राजस्थानी तरीके से दाल बाटी चूरमा बनाकर देखिए – यकीन मानिए, इसका स्वाद आप कभी नहीं भूल पाएंगे।